शारीरिक शिक्षा

क्रांतिकारियोंकीकलम

बंकिमचंद्रचट्टोपाध्यायद्वारासंन्यासीआंदोलनवबंगालअकालकीपृष्ठभूमिपररचितउपन्यासआनंदमठकीक्रांतिकारीविचारधारानेदेशमेंसामाजिक-राजनीतिकचेतनाजागृतकरनेकाकामकिया।इसकेगीतवंदेमातरम्कोराष्ट्रगीतकादर्जामिला।बंकिमबाबूकीपुण्यतिथि(आठअप्रैल)परपढ़िएइसकालजयीकृतिकाअंश...

एकाएकअपनेसाहबकोमराहुआदेखऔरअपनीरक्षाकेलिएकिसीकोआज्ञादेतेनदेखकरसरकारीसिपाहीडटकरभीनिश्चेष्टहोगए।इसअवसरपरतेजस्वीडाकुओंनेसिपाहियोंकोहताहतकरआगेबढ़करगाड़ीपररखेहुएखजानेपरअधिकारजमालिया।सरकारीफौजीटुकड़ीभयभीतहोकरभागगई।

अंतमेंवहव्यक्तिसामनेआयाजोदलकानेतृत्वकरताथाऔरपहाड़ीपरखड़ाथा।उसनेआकरभवानंदकोगलेलगालिया।भवानंदनेकहा, ‘भाईजीवानंद!तुम्हारानामसार्थकहो।’

इसकेबादअपहृतधनकोयथास्थानभेजनेकाभारजीवानंदपरआगया।वहअपनेअनुचरोंकेसाथखजानालेकरशीघ्रहीकिसीअन्यस्थानकीओरचलेगएऔरभवानंदअकेलेखड़ेरहगए।

बैलगाड़ीसेकूदकरएकसिपाहीकीतलवारछीनकरमहेंद्रसिंहनेभीचाहाथाकियुद्धमेंयोगदे,लेकिनइसीसमयउन्हेंप्रत्यक्षदिखाईदियाकियुद्धमेंलगाहुआदलऔरकुछनहींडाकुओंकादलहै-धनछीननेकेलिएइनलोगोंनेसिपाहियोंपरआक्रमणकियाहै।यहविचारकरमहेंद्रयुद्धसेविरतहोदूरजाखड़ेहुएथे।उन्होंनेसोचाकिडाकुओंकासाथदेनेसेउन्हेंभीदुराचारकाभागीबननापड़ेगा।वेतलवारफेंककरधीरे-धीरेवहस्थानत्यागकरजारहेथे,इसीसमयभवानंदउनकेपासआकरखड़ेहोगए।महेंद्रनेपूछा,‘महाशयआपकौनहैं?’

भवानंदनेकहा,‘इससेतुम्हेंक्याप्रयोजनहै?’

महेंद्र,‘मेराकुछप्रयोजनहै।आजआपकेद्वारामैंविशेषउपकृतहुआहूं।’

भवानंद,‘मुझेऐसानहींलगताथाकितुम्हेंइतनाज्ञानहै।हाथोंमेंहथियाररहतेहुएभीतुमयुद्धसेविरतरहे...जमींदारोंकेलड़केघी-दूधकाश्राद्धकरनातोजानतेहैं,लेकिनकामकेसमयबंदरबनजातेहैं!’

भवानंदकीबातसमाप्तहोते-न-होतेमहेंद्रघृणाकेसाथबोले,‘यहतोअपराधहै,डकैतीहै।’

भवानंदनेकहा,‘हांडकैतीहै।हमलोगोंकेद्वारातुम्हाराकुछउपकारहुआथा,साथहीऔरकुछउपकारकरनेकीइच्छाहै।यदिइच्छाहोतोमेरेसाथआओ,तुम्हारीस्त्री-कन्यासेमुलाकातकरादूंगा।’कहकरवेआगेबढ़गए।महेंद्रचुप,शांत,गर्वितऔरकुछकौतुहलमेंभीआगए।अंतमेंसाथ-साथआनेलगे।

सहसाभवानंदनेभिन्नरूपधारणकरलिया।वेअबस्थित-मूर्ति,धीर-प्रवृत्तिसंन्यासीनरहे।वहरणनिपुणवीरमूर्ति,अंग्रेजसेनाध्यक्षकासिरकाटनेवालारुद्ररूपअबनरहा।अभीजिसगर्वितभावसेवेमहेंद्रकातिरस्कारकररहेथे,अबवहभवानंदनथे-मानोज्योत्सनामयी,शांतिमयीपृथिवीकीतरु-कानन-नद-नदीमयशोभानिखरकरउनकेचित्तमेंविशेषपरिवर्तनहोगयाहो।चंद्रोदयहोनेपरसमुद्रमानोहंसउठा।भवानंदहंसमुख,मुखर,प्रियसंभाषीबनगएऔरबातचीतकेलिएबहुतबेचैनहोउठे।भवानंदनेबातचीतकरनेकेअनेकउपायरचे,लेकिनमहेंद्रचुपहीरहे।तबनिरुपायहोकरभवानंदनेगानाशुरूकिया-

सुजलांसुफलांमलयजशीतलाम्

शस्यश्यामलांमातरम्....।’

महेंद्रगानासुनकरकुछआश्चर्यमेंआगए।वेकुछसमझनसके-‘सुजलांसुफलांमलयजशीतलाम्,शस्यश्यामलामाताकौनहै?’उन्होंनेभवानंदसेपूछा,‘यहमाताकौनहै?’

प्रश्नकाकोईउत्तरनदेकरभवानंदगातेरहे-

‘शुभ्रज्योत्सनापुलकितयामिनीम्

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्

सुहासिनीसुमधुरभाषिणीम्

सुखदांवरदांमातरम्।’

महेंद्रबोले,‘यहतोदेशहै,यहतोमांनहींहै।’

भवानंदनेकहा,‘हमलोगदूसरीकिसीमांकोनहींमानते।‘जननीजन्मभूमिस्वर्गादपिगरीयसी’-हमारीमाता,जन्मभूमिहीहमारीजननीहै-हमारीनमांहैं,नपिता,नभाई-कुछभीनहींहै।स्त्रीनहीं,घरनहीं,अगरकोईहैतोवहीसुजलांसुफलांमलयजशीतलाम्,शस्यश्यामला...।’

अबमहेंद्रनेसमझकरकहा,‘तोफिरगाओ!’

भवानंदभीगानेलगे-

सुजलांसुफलांमलयजशीतलाम्

शस्यश्यामलांमातरम्....।

शुभ्रज्योत्सनापुलकितयामिनीम्

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्

सुहासिनीसुमधुरभाषिणीम्

सुखदां,वरदांमातरम्।।

सप्तकोटकण्ठ-कलकलनिनादकराले,

द्विसप्तकोटिभुजैर्धृतखरकरवाले,

अबलाकेनोमांतुमिएतोबले!

बहुबलधारिणीम्नमामितारिणीम्

रिपुदलवारिणीम्मातरम्।।

तुमीविद्या,तुमीधर्म,

तुमीहरि,तुमीकर्म,

त्वंहिप्राण:शरीरे।

बाहुतेतुमीमांशक्ति,

हृदयेतुमीमांभक्ति,

तोमारईप्रतिमागड़ीमंदिरे-मंदिरे।

त्वंहिदुर्गादशप्रहरणधारिणी,

कमलाकमल-दल-विहारिणी,

वाणीविद्यादायिनीनमामित्वं

नमामिकमलां,अमलां,अतुलाम,

सुजलां,सुफलां,मातरम्

श्यामलां,सरलां,सुस्मितां,भूषिताम्

धरणी,भरणीमातरम्।।

By Cooke